Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग कथनी और करनी के अंतर को दर्शाते हैं। इस लेख में पढ़ें उनके प्रसिद्ध दोहों का भावार्थ और जीवन में उनका महत्व।

पूर्व परिचय-
कबीरदास कथनी और करनी के एकत्व पर बल देते हैं। यदि कथनी को आचरण में न उतारा जाए तो वह व्यर्थ है। कथनी के अनुसार न चलने वाले की बड़ी दुर्दशा होती है। पढ़ना, गुनना, गाना आदि भी कथनी के ही रूप हैं। अक्षर ज्ञान तथा शास्त्र के आख्यान को अपने भाव में उतारना आवश्यक होता है। उसमें भावात्मक तल्लीनता अपेक्षित होती है। प्रेम के एक अक्षर से ही कोई व्यक्ति पांडित्य पा सकता है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा १
कथणीं कथी तौ का भया, जे करणीं नाँ ठहराइ।
कालबूत के कोटज्यूं, देषतही ढहि जाइ ।।१।।
व्याख्या-
कथनीय (जो कहने योग्य है) उसके विषय में कथन करने से क्या लाभ? यदि उसे कर्म में नहीं उतारा जाता। ऐसी कथनी कच्ची मिट्टी के परकोटे के समान देखते हो देखते ढह जाती है। कालबुद’ फारसी का शब्द है, इसका अर्थ है कच्चा भराव जिस पर मेहराब बनती है। दृष्टांत अलंकार है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा २
रांमहिं रांम पुकारते, जिभ्या परिगौ राँस।
सूधा जल पीवै नही, खोदि पियन कौ हाँस ।।२।।
व्याख्या-
राम का नाम पुकारते-पुकारते जीभ में छाले पड़ गए। अब शुद्ध जल जो पहले कसे प्राप्त है पीने की इच्छा नहीं है, जल को खोदकर पीने की इच्छा है। ऐसा जल (अमृत जल) जो राम रस के रूप में प्राप्त ठोता है जिसकी उपलब्धि निजी साधना से ही संभव है।
अन्योक्ति अलंकार, रूढ़ साधना छोड़कर मौलिक साधना की चाह व्यक्त की गयी है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा ३
जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल।
पार ब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल ।।३।।
पाठान्तर-
१. नियरा
व्याख्या-
प्राणी के मुख से जैसी बात निकलती है अगर वह वैसी चाल भी (करनी) भी करता है तो परमात्मा उसके निकट ही रहता है और अन्य जीवों को वह पल भर में ही अपना बना लेता है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा ४
जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै नाहिं।
मानिष नहीं ते स्वांन गति, बाँध्या जमपुर जाहिं ।।४।।
व्याख्या-
जो प्राणी जैसा कथन करता है यदि उसी का वह पालन नहीं करता तो वह मनुष्य नहीं है, उनकी दशा कुत्तों जैसी है। ऐसे लोग काल द्वारा बँधकर जमपुर ले जाये जाते है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा ५
पद गाएँ मन हरषियाँ, साषी कह्या अनंद।
सो तत नांउं न जाणिया, गल मैं पड़िया फंघ ।।५।।
व्याख्या-
पद का गान करने से मन हर्षित हो गया तथा साखी कहने से आनंदित हो उठा परन्तु यदि उस परम तत्त्व का नाम न जाना तो गले में जन्म-मरण का फंदा पड़ जाता है। प्रद गाना या साखी पढ़ना भी राम नाम के मर्म को समझे बिना मुक्ति दायक नहीं है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा ६
करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तूंड।
जाँणै बूझै कछू नहीं, यौं ही आंधा रुंड ।। ६ ।।
व्याख्या-
अपना मुख ऊँचा किये हुए जो कीर्तन करता हुआ दिखाई देता है वह आधे बड़ के जैसा है जा कुछ भी नहीं जानता समझता है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा ७
मैं जान्यूँ पढ़िबौ भलौ, पढ़िबा थै भलौं जोग।
राँम नाँम सूँ प्रीति करि, भल-भल नीदों लोग।।७।।
व्याख्या-
मैंने समझा कि पढ़ना (शास्त्रों का ज्ञान करना) अच्छा है लेकिन इस शब्द ज्ञान से तो कहीं अच्छी योग साधना है। कबीर ने तो राम-नाम से प्रेम कर लिया है, भले ही लोग इसके लिए उसकी निन्दा क्यों न करें।
सामान्य (पुस्तकीय) ज्ञान की अपेक्षा राम-नाम की महत्ता पर बल दिया गया है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा ८
कबीर पढ़िबो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाइ।
बाँवन अधिर सोधि कर, ररै ममैं चित लाइ । । ८ ।।
व्याख्या-
पढ़ने अर्थात् शास्त्राध्ययन से अपने को अलग कर पुस्तक को बहा दो। वर्णमाला के बावन अक्षरों को शोधकर केवल रकार और मकार अर्थात् ‘राम’ को ही चित्त में धारण करो।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा ९
कबीर पढ़िबो दूरि करि, आथि पढ्या संसार।
पीड़ न उपजी प्रीति सूँ, तो क्यूँ करि करै पुकार ।।९।।
व्याख्या-
कबीर कहते हैं कि शास्त्रीय ज्ञान से अपने को दूर कर लो। सारा संसार पढ़ा हुआ ही है। परमात्मा के प्रेम के साथ-साथ यदि पीड़ा नहीं जागती तो किस प्रकार तुम उसकी पुकार करोगे।
साखी में शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा प्रेम और विरह की महत्ता व्यंजित है।
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग | दोहा १०
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
एकै आखिर पीव का, पढ़े सो पंडित होइ ।।१०।।
पाठान्तर-
१. प्रेम
व्याख्या-
सारे सांसारिक लोग पुस्तक पढ़ते-पढ़ते मर गये कोई भी पंडित (वास्तविक ज्ञान रखने वाला) नहीं हो सका। परन्तु जो अपने प्रिय परमात्मा के नाम का एक ही अक्षर जपता है (या प्रेम का एक अक्षर पढ़ता है) वही सच्चा ज्ञानी (पंडित) होता है। वही परमतत्त्व का सच्चा पारखी होता है।
निष्कर्ष
कबीरदास जी का मानना था कि केवल उपदेश देना, गाना, सुनाना या पढ़ना पर्याप्त नहीं है। जब तक उसे आचरण में न उतारा जाए, तब तक वह व्यर्थ है। जीवन में सच्चा बदलाव लाने के लिए केवल ज्ञान नहीं, उस ज्ञान का व्यवहार में प्रयोग आवश्यक होता है। यही “कथनी और करनी” का मूल है। यहि Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | कथणी-करणीं का अंग मे कबीर साहिब ने हमे समझाया है ।