Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १०- १८ |

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Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १०- १८ |

“Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे (दोहा 10-18): जानिए ‘निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग’ जैसे गूढ़ विचारों का भावार्थ। संत कबीर के अमर दोहों की सरल व्याख्या और आध्यात्मिक संदेश।”

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे  निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग  दोहा १०- १८
Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे  निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग  दोहा १०- १८ 



Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १०

जब लग भगति सकामता, तब लग निर्फल सेव।

कहै कबीर वै क्यूँ मिलें, निहकामी निज देव ।।१०।।


शब्दार्थ
लग तक, सकामता कामना सहित, सकाम, निहकामी = निष्कामी ।

व्याख्या
कबीर का विचार है कि जब तक भक्ति सकाम होती है तब तक भगवत् सेवा निष्फल रहती है। निष्काम ईश्वर की प्राप्ति सकाम भक्ति से कैसे संभव है ?

इस साखी में भक्ति को साध्य और साधन दोनों माना गया है। भक्त के मन में कुछ भी पाने की अभिलाषा नहीं होनी चाहिए। कामना युक्त भक्ति फलहीन होती है।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा ११


आसा एक जु राम की, दूजी आस निरास ।

पाँणी माँहें घर करें, ते भी मरें पियास ।। ११ ।।


शब्दार्थ
दूजी दूसरी, पाँणी पानी।

व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि एकमात्र राम की आशा करनी चाहिए, अन्य प्रकार की आशा निराशा ही है। पानी में घर बनाकर भी यदि कोई प्यासा मरे तो विडम्बना ही कही जायेगी।

इस साखी में राम के अलावा अन्य देवी-देवताओं के आश्रय को निरर्थक कहा गया है। कबीर के कथन का अभिप्राय यह है कि परमब्रह्म आनन्द सागर की तरह है। उसके साथ अभेदत्व का सम्बन्ध होते हुए भी जीव में तृष्णा क्यों रहती है ? पूर्णकाम ब्रह्मानन्द में लीन होते हुए भी जीव अन्य देवी-देवताओं का आश्रय ग्रहण करने के कारण ही प्यासा रहता है। निदर्शना अलंकार की योजना दर्शनीय है।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १२


जे मन लागें एक सूँ, तौं निरवाल्या जाइ।

तूरा दुइ मुखि बाजणाँ, न्याइ तमाचे खाइ । ।१२ ।।


शब्दार्थ
निरबाल्या = निस्तार, छुटकारा, तूरा- तुरही।

व्याख्या
कबीर कहते हैं कि यदि एक से मन लगा है तो निस्तार हो सकता है और यदि दो तुरही को एक साथ एक मुख से बजाने की कोशिश की जायेगी तो उनका बजना मुश्किल होगा। ऐसी स्थिति में बजाने वाले का तमाचा खाना उचित ही है।

कबीर का मंतव्य है कि जो साधक अद्वैत ब्रह्म में ध्यान लगाता है या उसकी भक्ति करता है वह तो सफलता पा लेता और जो दो में, द्वैत में विश्वास करता है उसे दुःख ही मिलता है। दो तुरही को एक साथ बजाने का यह भी तात्पर्य है कि ईश्वर की भक्ति तथा सांसारिक भोग एक साथ नहीं हो सकता है।

कुछ टीकाकारों ने दूसरी पंक्ति का अर्थ इस प्रकार से भी किया है, जो बहुत सटीक नहीं है। तुरी बाजा दो मुखों से बजता है, अतः उसके स्वर को ठीक करने के लिए उसे हाथ से, कभी एक मुँह पर कभी दूसरे मुँह पर ठोंकना पड़ता है। दोनों मुखों में सरसता तो होती नहीं? अतः बाजे का तमाचा खाना उचित है। तुरी (तुरही) का दूसरा मुख बहुत चौड़ा होता है इसलिए उस तरफ से उसको बजाया ही नहीं जा सकता। अतः यहाँ ‘दुइ तूरा’ मानना उचित है। ‘दुइ मुखि’ नहीं। इसमें अर्थान्तरन्यास अलंकार है।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १३


कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुत ज मीत।

जिन दिल बंधी एक सूँ, ते सुख सोवै नचींत ।।१३।।


पाठान्तर
तिवारी १. पावै नीत

शब्दार्थ
बहुत ज – बहुत सी वस्तुओं, मीत मित्रता, नचींत = निश्चिंत ।

व्याख्या
कबीर कहते हैं कि मनुष्य कलियुग में जन्म ग्रहण करके अनेक सांसारिक जीवों तथा वस्तुओं से मित्रता कर ली है। इसीलिए वह अनेक दुःखों को भोगता हुआ बेचैन रहता है। जिसने अपना मन ईश्वर से बाँध दिया अर्थात् प्रभु में दत्तचित्त हो गया वह निश्चिंत होकर सुख से सोता है (या तिवारी नित्य सुख पाता है)। अन्योक्ति अलङ्कार की सुन्दर योजना दर्शनीय है।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १४

कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउँ।

गलै राम की जेवड़ी, जित खेंचे तित जाउँ ।।१४।।


शब्दार्थ
कुता कुत्ता, नाउँ नाम, जेवड़ी रस्सी ।

व्याख्या
कवीर कहते हैं कि मैं राम का कुत्ता हूँ। मेरे गले में राम की रस्सी पड़ी हुई है, वह जहाँ खींचकर ले जाता है मैं वहीं चला जाता हूँ।

इसमें अनन्य भक्ति तथा प्रपत्तिभाव की व्यंजना है। ‘मुतिया’ शब्द से एक निरीह दुम हिलाते कुत्ते का विम्ब निर्मित हो जाता है। पूर्वी बोलियों के ‘ड्या’ प्रत्यय का प्रयोग कुत्ते के नाम की यथार्थता को साकार कर देता है। अक्खड़ कबीर भक्ति के क्षेत्र में कितने अधिक विनीत हो जाते हैं इस साखी में द्रष्टव्य है।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १५

तो तो करै त बाहुड़ों, दुरि दुरि करै तौ जाउँ।

ज्यू हरि राखें यूँ रहौं, जो देवै सो खाउँ ।।१५।।


शब्दार्थ
बाहुड़ो लौटना, जाऊँ = चला।

व्याख्या
कबीर कहते हैं कि जब राम ‘तू तू’ करके प्यार से पुकारता है तो उसके पास चला जाता हूँ और जब ‘दुर दुर दुर कहकर हटाता है है। तो अपना कल्याण समझकर दूर हट जाता हूँ, भगवान् जैसे मुझे रखता रखता है वैसे ही रहता हूँ। हूँ और जो कुछ खाने को देता है वही खाता हूँ।

इस साखी में पालतू कुत्ते के विम्ब से (बदलें) पूर्ण समर्पण की भावना को व्यंजित किया गया है। ‘तू’ और ‘दुर’ ध्वनि मूलक शब्द हैं जो कुत्ते को बुलाने और हटाने के लिए प्रयुक्त होते हैं।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १६

मन प्रतीति न प्रेम रस, नाँ इस तन मैं ढंग।

क्या जाणों उस पीव सूँ, कैसे रहसी रंग ।।१६।।


शब्दार्थ
प्रतीति – जानकारी, विश्वास, ढंग रीति, सलीका।

व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि मन में पूर्ण विश्वास नहीं है और न प्रेम रस है। उन्हें खुश करने का ठीक तरीका भी मुझे ज्ञात नहीं है। न जाने कैसे मैं प्रिय मिलन के आनन्द का उत्सव मना पाऊँगी अर्थात् प्रिय मिलन से उत्पन्न उमंग की अभिव्यक्ति कैसे कर पाऊँगी ?

कबीर ने यहाँ आत्मा को एक मुग्धा नायिका के रूप में चित्रित किया है। या यो कहें कि वह ‘गाम गहेली’ है। उसके पास अभिव्यक्ति के माध्यम तो नहीं हैं किन्तु प्रियतम से मिलन की तीव्र उत्कंठा है। लौकिक प्रेम के बिम्ब से अलौकिक प्रेम की व्यंजना का प्रयल है। समासोक्ति अलंकार की योजना की गयी है। साखी में वक्रोक्ति की भी छाया है। निरीहता प्रदर्शित करने के लिए निषेधात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १७

उस सग्रंथ का दास हौं, कदे न होई अकाज।

पतिव्रता नाँगी रहै, तौ उसही पुरिस कौं लाज ।।१७।।


शब्दार्थ
सग्रंथ = समर्थ, कदे कभी, नॉगी = नंगी।

व्याख्या
कबीर कहते हैं कि मैं सर्व-शक्तिमान पूर्ण समर्थ भगवान् का सेवक हूँ।

इसलिए मेरा भी अमंगल नहीं होगा। यदि पतिव्रता नारी नंगी रहती है तो उसकी लाज उसके स्वामी को होती है। वह उसके वस्त्र की चिन्ता करता है और उसका प्रबन्ध करता है। इसी तरह से जो भक्त ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित है, उसकी लाज की रक्षा ईश्वर करता है।

श्रीमद्भगवतगीता में कहा गया है-

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना तेषांनित्याभियुक्तानां योगक्षेमं पर्युपासते । वहाम्यहम् ।।

साखी में दृष्टांत अलङ्कार का प्रयोग किया गया है।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | निहकर्मी प्रतिव्रता का अंग | दोहा १८

धरि परमेसुर पाँहुणाँ, सुणों सनेही दास।

घट रस भोजन भगति करि, ज्यूँ कदे न छांड़ै पास।।१८।।


शब्दार्थ 
घरि = घर में, सनेही स्नेही, कदे कभी।

व्याख्या
कबीर कहते हैं कि हे स्नेही भक्तों राम रूपी पति (घर का दामाद, अतिथि) तुम्हारे शरीर रूपी घर में मौजूद है। उसे भक्ति के षटरस भोजन से तृप्त रखो जिससे वह साथ छोड़कर कभी न जाय।

कबीर ने रूपक अलंकार के द्वारा ईश्वर के शाश्वत प्रतीति भाव तथा भक्ति की निरन्तर साधना से आत्मा और परमात्मा के सामीप्य के संरक्षण की अभिव्यंजना की है।

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