Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | गुरूदेव का अंग | दोहा 1-5 |

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | गुरूदेव का अंग | दोहा 1-5 |

    Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | गुरूदेव का अंग | दोहा 1-5 | इस पोस्ट में हम लाएं हैं कबीर दास के प्रसिद्ध दोहों का संग्रह “गुरूदेव का अंग”। इस पहले हिस्से में, हम पाँच महत्वपूर्ण दोहों को साझा करेंगे, जो हमें जीवन के मूल्यों, धर्म, और भक्ति के महत्वपूर्ण सिख सिखाते हैं। कबीर के दोहों में छिपी अद्भुत ज्ञानवर्धनी बातें हमें एक सांत्वना और आत्मबोध का अहसास कराती हैं। यह सारांश हमें उनकी सोच और उनके दृष्टिकोण की महत्वपूर्णता को समझने में मदद करेगा।

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | गुरूदेव का अंग | दोहा 1 |

सतगुर सवाँन को सगा, सोधी सईं न दाति ।

हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति ।। १ ।। 

शब्दार्थ – 

सवाँन = समान, सोधी = शुद्धि, तत्त्व शोधक, दाति = दान, दाता, हितू =हितैषी, हरिजन = ईश्वरभक्त ।

व्याख्या :- 

    प्रस्तुत दोहे में सद्गुरु तत्त्वशोधक,ईश्वर और भक्त की महिमा का प्रतिपादन किया गया है। कबीर का मंतव्य है कि सद्गुरु के समान कोई अन्य निकट सम्बन्धी नहीं है। यद्यपि संसार में बहुत से रिश्ते नाते हैं, कोई भाई है, कोई बहिन है, कोई माता है और कोई पिता, कोई पति है और कोई पत्नी । इस तरह अनन्त रिश्तों का जाल बना हुआ है। इनमें से कोई भी व्यक्ति भक्त को अज्ञान के तमस से हटाकर ज्ञान के आलोक में ले जाने की क्षमता नहीं रखता, कोई भी आत्मा और परमात्मा के अभेदत्व को प्रत्यक्ष नहीं करा सकता और कोई भी भवसागर में डूबती हुई जर्जर नौका को पार नहीं लगा सकता । 

    भारतीय धर्म-व्यवस्था में दान की बड़ी महिमा है। अन्न, वस्त्र, द्रव्य आदि वस्तुओं तुलना में शुद्धता का दान श्रेष्ठ है | तत्त्वशोधक सन्त ही सबसे बड़ा दाता है जो अपने सर्वस्व को आत्म – हित तथा लोक-हित के लिए अर्पित कर देता है। समस्त प्राणि-जगत का पालक ईश्वर भक्तों का सबसे बड़ा शुभचिन्तक है । 

    वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ माना गया है । कबीर ब्राह्मण की उच्चता को नकारते हुए कहते हैं कि भगवान के भक्तों की जाति सर्वश्रेष्ठ होती है, वह परम्परागत जाति-व्यवस्था में चाहे सबसे निचली सीढ़ी में ही क्यों न हो ।

    स तथा ह वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है । सम्पूर्ण छन्द में वक्रोक्ति अलंकार माना जा सकता है। सवाँन और सई ऐसे तद्भव शब्द हैं जो कबीर की भाषा की लोकोन्मुखता को प्रकट करते हैं।


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | गुरूदेव का अंग | दोहा 2 |

बलिहारी गुर आपणै, द्यौं हाड़ी कै बार । 

जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार || २ ||

शब्दार्थ – 

द्यौं हाड़ी = दिन में, बार = देर

व्याख्या –

    जिस गुरु ने अपनी अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति द्वारा मुझे मनुष्य से देवता बना दिया। रूपान्तरण की इस प्रक्रिया में तनिक भी देर नहीं लगी। इस तरह के गुरु के प्रति मैं दिन में कितनी बार बलिहारी जाऊँ ।

    द्यौंहाड़ी शब्द दिवस + डी से निर्मित है जो विशिष्ट लोक प्रयोग है। इसका रूपान्तर दिहाड़ी है जो दैनिक का पर्याय है। तैं प्राचीन हिन्दी का करण अपादान का परसर्ग है। बार-बार में यमक अलंकार है ।


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | गुरूदेव का अंग | दोहा 3 |

सतगुर की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार ।

लोचन अनँत उघाडिया, अनँत दिखावणहार ।। ३ ।।

शब्दार्थ – 

अनँत = असीमित, लोचन = आँख, उघाड़िया = उद्घाटित किया । 

व्याख्या –

       ज्ञान के आलोक से सम्पन्न सद्गुरु की महिमा असीमित है। उन्होंने मेरा जो उपकार किया है वह भी असीम है। उसने मेरे अपार शक्ति सम्पन्न ज्ञान-चक्षु का उद्घाटन कर दिया जिससे मैं परम तत्त्व का साक्षात्कार कर सका । ईश्वरीय आलोक को दृश्य बनाने का श्रेय महान् गुरु को ही है ।

    कबीर ने तत्सम और तद्भव शब्दों के उचित विन्यास से गुरु की अपार शक्ति,उपकारी वृत्ति तथा आध्यात्मिक कर्म को व्यंजित किया है।


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | गुरूदेव का अंग | दोहा 4 |

राम नाम कै पटतरै देबै कौं कछु नाहिं ।

क्या लै गुर संतोषिए, हौंस रही मन माँहि ।। ४ ।। 

शब्दार्थ – 

पटतरै समान वस्तु, हौंस = प्रबल अभिलाषा, माँहि = में ।

व्याख्या – 

    गुरु ने मुझे राम नाम की अमूल्य वस्तु दी । उसके समान या उसकी तुलना की कोई भी वस्तु मेरे पास नहीं है। इसलिए मैं गुरु को (गुरु दक्षिणा के रूप में) क्या अर्पित करूँ ? राम नाम के समरूप कोई वस्तु उपलब्ध न होने के कारण मैं गुरु को कैसे सन्तुष्ट करूँ? गुरु को सन्तुष्ट करने का हौंसला (उत्कट अभिलाषा) मेरे मन में बना ही रह गया। इस कार्य को न कर पाने के कारण मन की चाह मन में ही दबी रह गयी ।

    संतोष संज्ञा से संतोषिए क्रिया का निर्माण किया गया है। इससे कबीर की भाषाक्षमता का परिचय मिलता है । ‘हौंस’ देशी शब्द में अभिलाषा और उमंग की जैसी व्यंजना है वैसी किसी अन्य शब्द में संभव न हो पाती । सम्पूर्ण साखी में राम नाम के अनुपम माहात्म्य, गुरु की निःस्वार्थ कृपा एवं शिष्य की कृतज्ञता को अभिव्यंजित किया गया है । 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | गुरूदेव का अंग | दोहा 5 |

सतगुरु के सदकै करूँ, दिल अपणी का साछ (साँच) ।

कलयुग हम स्यूं लड़ि पडूया मुहकम मेरा बाछ ।। ५ ।। 


शब्दार्थ – 

सदकै = न्यौछावर, साछ – साक्षी, (साँच= सच्चा) स्यूं = से, मुहकम = दृढ़ । 

व्याख्या – 

    मैं अपने सद्गुरु के प्रति अपने को न्यौछावर करता रहता हूँ । अर्थात् उनके ज्ञान और उपदेश के प्रति आस्थावान हूँ। मेरे हृदय में किसी तरह का विकार या द्वन्द्व भी नहीं है। गुरु के प्रति पूर्ण सच्चाई के साथ समर्पित हूँ। मेरी इस दृढ़ प्रतिज्ञा या दृढ़ सम्बन्ध को देखकर कलयुग अपनी बुराइयों के साथ मुझसे युद्ध के लिए तैयार है। मुझे पूरा भरोसा है कि मैंने जिसके ज्ञान को अपना रक्षक समझा है वह कलयुग के प्रहारों से मुझे अवश्य बचायेगा। प्रस्तुत साखी में कबीर ने सदकै, दिल, मुहकम आदि अरबी-फारसी के शब्दों का प्रयोग किया है ।

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