Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा 1-10 |

Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा १-१०  |

   बीर दास, भारतीय साहित्य के महान कवि में से एक, ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को अनमोल शिक्षाएं दी हैं। उनके दोहे, जिन्हें ‘कबीर के दोहे – Kabir Ke Dohe ‘ कहा जाता है, विभिन्न आध्यात्मिक और सामाजिक तथा मानवता के मुद्दों पर आधारित हैं।

    इस पोस्ट में हम ‘कबीर के दोहे – Kabir Ke Dohe ‘का एक विशेष अंश, ‘विरह का अंग’ दोहा 1-10, को विवेचना करेंगे। इस दोहे में कबीर ने प्रेम और विरह के माध्यम से जीवन की अनिष्ट स्थिति का वर्णन किया है। उनकी भाषा सीधी और सरल है, जिससे यह दोहा सुनने वाले के मन को छू जाता है।

    कबीरदास  के इस दोहे  Kabirdas Ke Dohe के माध्यम से हमें प्रेम और विरह के भाव की अद्वितीयता और उनके द्वारा बताई गई आत्मा की अमिट शक्ति का अनुभव होता है। यह दोहा हमें जीवन के अद्वितीयता और आत्मा के महत्वपूर्ण तत्वों के प्रति जागरूक करता है।

    कबीर के दोहे   Kabirdas Ke Dohe का अध्ययन करके हम अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन कर सकते हैं और समाज में सामंजस्य एवं सद्गुणों की प्रोत्साहना कर सकते हैं।

 Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा १  |

रात्यूँ रुँनी बिरहनीं, ज्यूं बंचौ कूँ कुंज |

कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या बिरहा पुंज ।। १ ।। 

शब्दार्थ-

रात्यूं = रात में, रुँनी = रोती है, बंचौ = वंचित, कुंज = क्रौंच, अंतर = हृदय में, प्रगट्या = प्रकट हुआ । 

व्याख्या –

    विवेक के जागृत होने पर आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध का ज्ञान आत्मा रूपी प्रेयसी को हो गया । वह आत्मा रूपी विरहिणी शेष जीवन उसी तरह रोती रही, जैसे क्रौंच पक्षी अपने साथी से बिछुड़ कर रोता है । कबीरदास का कथन है कि विरह का पुंज प्रकट हो गया है, जिससे जीवात्मा के हृदय में ज्वाला प्रज्ज्वलित हो रही है। इस साखी में रहस्यवाद की मार्मिक अभिव्यंजना की गयी है। उपमा, रूपक तथा अनुप्रास अलंकारों की सहज नियोजना द्रष्टव्य है । 

    कबीर के हृदय की द्रवणशीलता, भाव विह्वलता तथा रसानुभूति की व्यंजना अतिशय प्रगाढ़ है । यह साखी उनके कवि हृदय की परिचायक है। विरह के अतिशय पीड़ा-बोध का उपमान क्रौंच पक्षी बहुत पहले से कवियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। जिस क्रौंच की वियोग-व्यथा से विगलित होकर आदि कवि की रचनात्मक ऊर्जा स्वतः क्रियाशील हो गयी थी उसी तरह का क्रौंच कबीर की व्यथा कथा का प्रतीक बन गया है। 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा २  |

अंबर कुंजाँ कुरलियाँ, गरजि भरे सब ताल | 

जिन थैं गोबिंद बीछुटे, ‘ तिनके कौण हवाल ।।२।। 

शब्दार्थ – 

अंबर = आकाश, कुंजाँ = क्रौंच, कुरलियाँ = क्रंदन किया, ताल = तालाब, = जलाशय । 

व्याख्या 

    आसमान में क्रौंच पक्षी ने विरह-व्यथा से करुण क्रंदन किया, जिससे विचलित होकर बादलों ने गरज कर सभी जलाशयों को भर दिया। जिनसे गोविन्द विमुक्त हो गये हैं. उनका क्या हाल होगा? तिवारी -जिनसे साहब बिछड़ गया है उनका क्या हाल होगा। कबीर प्रथम पंक्ति में तो एक वियोगी पक्षी की दीनता भरी पुकार और उसके प्रभाव को व्यक्त करके, दूसरी पंक्ति में एक प्रश्न-वाचक चिह्न छोड़कर चुप हो जाते हैं और राम वियोगी की विरह-व्यथित पुकार की प्रभावात्मकता के अनुभव को पाठकों की संवेदना पर छोड़ देते हैं। 

    जब एक छोटे से जीव के विरह की यह दशा है तो विराट ब्रह्म के अनन्त वियोग की कितनी गहन पीड़ा होगी और उसमें कितनी व्यापक द्रवण-शीलता होगी? यदि क्रौंच के कुरलने से बादल बरस सकते हैं तो क्या वियोगी आत्मा के कुहकने से अपार आनन्द-रस की वर्षा नहीं हो सकती है, जिससे सम्पूर्ण सृष्टि की रिक्तता पूर्ण हो जाय । इस साखी के प्रथम चरण में विभावना, द्वितीय चरण में वक्रोक्ति का विधान है। 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा ३   |

चकवी बिछुटी’ रैणि की, आइ मिली परभाति । 

जे जन बिछुटे राम सूँ, ते दिन मिले न राति ।।३ ।। 

शब्दार्थ-

बिछुटी = वियोगिनी, रैणि == रात, परभाति = प्रातःकाल 

व्याख्या – 

    रात के समय में अपने प्रिय से बिछुड़ी हुई चकवी प्रातःकाल होने पर अपने प्रिय से मिल गयी । किन्तु जो लोग राम से विलग हुए हैं, वे न तो दिन में मिल पाते हैं और न रात में । आत्मा पर्मात्मा का अंश होती हुई भी उससे मायादि की दीवार के कारण अपने को अलग समझती है। उसका यह वियोग कई जन्मों से चला आ रहा है। इस चिरन्तन विरह की अनुभूति को झेलना कितना कठिन है। इसमें व्यतिरेक की व्यंजना तथा दृष्टांत की योजना परिलक्षित होती है। इसमें ईश्वर मिलन की आकुलता को व्यंजित किया गया है। अन्य वियोगिनियों को देखकर मन को ढाढ़स बँधाया जा सकता है, किन्तु जब एक की कामना पूरी हो जाती है तो दूसरी की तड़प का बढ़ जाना स्वाभाविक है।


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा ४   |

बासुर सुख नां रैणि सुख, नाँ सुख सुपिनै माँहिं । 

कबीर बिछुट्या राम सूँ, ना सुख धूप न छाँह ।। ४ ।। 

शब्दार्थ- 

बासुरि = दिन ( वासर), रैणि = रात, सुपिनैं = स्वप्न में 

व्याख्या

    परमात्मा से विमुक्त जीवात्मा को न दिन में सुख मिलता है और न रात में । उसे स्वप्न में भी सुख उपलब्ध नहीं होता। उसे न धूप में और न छाया में, कहीं भी चैन नहीं मिल पाता । इस साखी में आत्मा की शाश्वत वियोग की व्यथा तथा आकुलता को व्यंजित किया गया है। अनुप्रास तथा विशेषोक्ति अलंकारों की नियोजना की गयी है। ‘वासर’ शब्द को भाषा की प्रकृति में परिवर्तित किया गया है । 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा ५   |

बिरहनि ऊभी पंथ सिरि, पंथी बूझै धाइ। 

एक सबद कहि पीव का, कब रे मिलेंगे आइ ।।५ ।। 

शब्दार्थ-

ऊभी = खड़ी, पंथ सिरि= रास्ते पर, बूझे = पूछती है, धाइ = दौड़ कर । 

व्याख्या – 

    आत्मा रूपी विरहिणी रास्ते में खड़ी है। वह हर गुजरने वाले पथिक से प्रियतम का हाल पूछती है। वह कहती है कि हे पथिक कम से कम एक शब्द तो बताओ कि प्रियतम कब आकर मुझसे मिलेंगे । इस साखी में ‘पंथ’ जीवन पथ का सूचक है। उसमें गुजरने वाले पथिक साधु महात्मा हैं। जिन्हें परमाता के विषय में पूर्ण ज्ञान है वे ही विरहिणी की दशा देखकर बता सकते हैं कि क्या उसकी प्रतीक्षा और साधना की चरम सीमा आ गयी है? क्या वह ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने की अधिकारिणी हो गयी है? भावात्मक रहस्यवाद की व्यंजना की गयी है । 

    विरहिणी की व्यग्रता, उत्सुकता तथा व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति अत्यन्त सरल शैली में की गयी है। आध्यात्मिक शृंगार की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति कबीर की प्रतिभा का ही परिणाम है। ‘ऊभी’ मराठी का बहुप्रचलित शब्द है। हिन्दी में इसका व्यवहार नगण्य है। 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा ६   |

बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम । 

जिव तरसै तुझ मिलन कूँ, मनि नाहीं विश्राम ।। ६ ।। 

शब्दार्थ – 

जोवती = देखती, बाट = रास्ता । हूँ । 

व्याख्या 

    हे राम में बहुत दिनों से तुम्हारा मार्ग देख रही है । अर्थात तुम्हारी प्रतीक्षा में लीन हूं । तुमसे मिलने के लिए मेरा की तड़प रहा है । मन में क्षण भर के लिए विश्रांती नहीं है ।

आत्मा और परमात्मा का वियोग चिरन्तन है। आत्मा अनन्त काल से परमात्मा से एकात्म होने के लिए आकुल है। परमात्मा के साथ अपने अभिन्न सम्बन्ध के ज्ञान के बाद तो उसको संसार में और भी बेचैनी का अनुभव होने लगा है। क्योंकि उसकी सम्पूर्ण चेतना ईश्वरोन्मुख हो गयी है। सम्पूर्ण छन्द में स्वभावोक्ति अलंकार है। कबीर का विरह चित्रण सूफियों के प्रेम विरह के चित्रों से कम मार्मिक नहीं है । 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा ७   |

बिरहिन ऊठै भी पड़े, ‘ दरसन कारनि राम ।

मूवाँ पीछे देहुगे, सो दरसन किहिं काम ।।७।। 

शब्दार्थ 

पड़े = गिर पड़े, मूवाँ = मृत्यु | 

व्याख्या-

    विरहिणी आत्मा इस लालसा से उठती है कि शायद प्रियतम आ गये हों, किन्तु शारीरिक निर्बलता के कारण वह अपने को सम्हाल नहीं पाती, फलतः गिर पड़ती है। (तिवारी- वह उठ उठकर जमीन पर गिर जाती है ।) उसकी शारीरिक शक्ति वियोग व्यथा के प्रभाव से क्षीण हो गयी है। उसके अन्दर अब और अधिक धीरज रखने की क्षमता नहीं है । 

    प्रियतम को सम्बोधित करके वह कहती है, कि हे स्वामी! लगता है तुम मरने के बाद ही दर्शन दोगे। मरणोपरान्त का दर्शन किस काम का होगा? इस साखी में मरण के पूर्व की स्थिति का चित्रण किया गया है। साधक की साधना का उत्तम फल यही है कि वह जीते जी अपने आराध्य को प्राप्त कर ले । मरणोपरान्त ही यदि ईश्वर का साक्षात्कार होता है तो वह उसकी साधना की न्यूनता का परिचायक है। जिस तरह सूफी कवि प्रेम का चित्रण करते समय प्रतीकात्मकता को विस्मृत कर देते हैं वैसे ही कबीर भी विरह के चित्रण में विरह के लौकिक पक्ष को पूर्णतया पुष्ट करते हैं। इस साखी में विरहिणी का बिम्ब उसकी पूर्ण व्याकुलता के साथ प्रत्यक्ष हो जाता है । 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा ८ |

मूवाँ पीछे जिनि’ मिलै, कहै कबीरा राम । 

पाथर घाटा लोह सब, ‘ (तब ) पारस कौणे काम ।।८ ।। 

शब्दार्थ- 

मूवाँ = मृत्यु, पाथर = पत्थर । 

व्याख्या –

    कबीरदास भगवान् से अनुनय करते हैं, कि हे राम! मरने के बाद दर्शन देने मत आना । यदि तुम्हें अपनी प्रिया से लगाव है, तो जीवितावस्था में ही दर्शन देने आ जाओ। पारस पत्थर की तलाश में जब सारा लोहा ही समाप्त हो जायेगा, तो पारस पत्थर मिलने से ही क्या लाभ होगा? (तिवारी – जब सारा लोहा मिट्टी में मिल गया तो पारस किस काम का) यहाँ कबीर विरह का चित्रण करते हुए लोक पक्ष को अधिक सबल बना देते हैं। उन्हें अपने दार्शनिक सिद्धान्त की भी परवाह नहीं रहती। कबीर की मुख्य मान्यता है कि जीवात्मा मरती नहीं केवल उसका एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानान्तरण होता है । दृष्टांत अलंकार का सुन्दर प्रयोग करते हुए कबीर ने हल्के उपालम्भ को भी व्यक्त 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा ९   |

 अंदेसडा न भाजिसी, संदेसौं कहियाँ । 

कै हरि आयाँ भाजिसी, कै हरि ही पासि गयाँ ।।९ ।। 

 शब्दार्थ – 

अंदेसड़ा = संशय, भाजिसी,=भागता, कहियाँ = कहने से ।

व्याख्या – 

    संदेश से संशय नहीं भागता । प्रियतम के विषय में दूसरों द्वारा दी गयी सूचनाओं से मन की द्वन्द्वात्मकता नहीं मिटती । इससे हृदय की पीड़ा का भी निवारण नहीं हो पाता। पीड़ा से मुक्ति के दो ही विकल्प हैं। पहला विकल्प है कि भगवान् स्वयं भक्त के पास आ जाय या भक्त ईश्वर के पास पहुँच जाय । मिलन के संदर्भ में प्रेमी या प्रेमिका में से कोई अभिसार के लिए आता है। कबीर ने दोनों पक्षों की ओर यहाँ संकेत किया है। प्रथम चरण में विशेषोक्ति अलंकार है। 


Kabir Ke Dohe- कबीर के दोहे | विरह का अंग | दोहा १०   |

 आइ न सकौं तुझ पै, सकूँ न तुझ बुलाइ । 

जियरा यौंही लेहुगे, बिरह तपाइ तपाइ ।।१० ।। 

शब्दार्थ- 

तुझ पै = तुम्हारे पास, जियरा = प्राण । 

व्याख्या–

    आत्मारूपी विरहिणी कहती है कि मैं तुम्हारे पास आने में असमर्थ हूँ। विरह के कारण मेरा शरीर बहुत क्षीण हो गया है। उसमें इतनी शक्ति शेष नहीं है कि एक लम्बा मार्ग तय करके प्रियतम के पास तक पहुँच सके। मैं इतने दिनों से तड़प-तड़प कर तुम्हारे नाम की रट लगाये हूँ। तुम मेरी दशा पर द्रवित होकर स्वयं आते नहीं हो । जोर जबरदस्ती से मैं तुम्हें बुलवा नहीं सकती हूँ। ऐसा लगता है कि मेरा और तुम्हारा मिलन हो नहीं पायेगा । 

    जिसकी पूरी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है। क्योंकि विरह की तड़प को शान्त करने में तुम्हीं पूर्ण सक्षम हो। मुझे प्रतीत होता है कि विरह की आग में तड़पा-तड़पा कर तुम यों ही मेरा प्राण ले लोगे । इस साखी में प्रियतम के प्रति उपालम्भ तथा जीवात्मा की सीमित शक्ति की अभिव्यंजना है। ‘तपाइ- तपाइ’ में पुनः शक्ति प्रकाश अलंकार की योजना की गयी है। एक विरहिणी की मार्मिक वेदना का उद्घाटन कबीर ने बड़ी कुशलता से किया है ।

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