Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लै का अंग

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Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे |  लै का अंग

पूर्व परिचय – 

इस अंग में परचा कौ अंग के भाव का विस्तार है कबीर इस अंग में में या परमतत्त्व में लय का चित्रण करते हैं। उन्होंने गंगा-यमुना (इड़ा -पिंगला) के बीच सहज शून्य के घाट पर मठ बना लिया है। वे कमल कुँवा के रस का निरन्तर पान कर रहे हैं। 

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे |  लै का अंग   | दोहा १   |

जिहि बन सीह न संचरै, पंषि उड़े नहिं जाइ । 

रैनि दिवस का गमि नहीं, तहाँ कबीर रह्या ल्यौ लाइ ।। १ ।। 

शब्दार्थ – 

वन = शून्य-शिखर, सहज अवस्था, सीह = सिंह, अहंकार रूपी जीव, पंषि = इन्द्रियाँ, पक्षी, रैनि = रात, ल्यौ ध्यान, लीन । 

व्याख्या –

    कबीरदास कहते हैं कि जिस वन में सिंह संचरण नहीं करता और पक्षी भी उड़कर नहीं जा सकते, जहाँ रात-दिन की भी स्थिति नहीं है, वहीं कबीर ने ध्यान लगा रखा है। 

    यह शून्यावस्था है या शून्य शिखर है, जहाँ मन अहंकार – ग्रस्त होकर नहीं पहुँच पाता, इन्द्रियरूपी पक्षी भी वहाँ नहीं जा सकते। वहाँ रात-दिन का विकल्प नहीं है। मात्र प्रकाश ही प्रकाश है, अर्थात् शाश्वत ज्योति की स्थिति है। कबीर ने इसी सहजावस्था में या शून्य शिखर में ध्यान केन्द्रित कर लिया है। इसमें परमात्मा के साक्षात्कार की स्थिति की भी व्यंजना है। 


Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे |  लै का अंग   | दोहा २   |

सुरति ढीकुली लेज ल्यौ, मन नित ढोलन हार ।

कँवल कुवाँ मैं प्रेम रस, पीवै बारंबार ।। २ ।। 

शब्दार्थ – 

सुरति = स्मृति, ईश्वरोन्मुखी रागात्मक वृत्ति, ढीकुली = पानी खींचने का यंत्र, लेज= रस्सी, ल्यौ = लय, ध्यान, लययोग, ढोलनहार = ढरकाने वाला, कँवल कुवाँ सहस्रार चक्र । 

व्याख्या – 

कबीरदास कहते हैं कि सहस्रार चक्र रूपी कमल कुआँ, प्रेम के रस से भरा हुआ है। स्मृति रूपी ढेकुली और लय रूपी रस्सी से जल खींच-खींच कर मन नित्य शरीर के अन्दर ढलकाता रहता है । कबीर ने सिंचाई के एक यंत्रविशेष (साधन) के बिम्ब के माध्यम से ब्रह्मानुभूति-जनित शाश्वत आनन्द को व्यंजित किया है। इसमें योग और भक्ति का सूक्ष्म सम्मिश्रण है। 

लोक से गृहीत उपमानों तथा प्रतीकों में कबीर ने नई अर्थ – क्षमता भर दी है। ब्रह्मानुभूति जैसी जटिल अनुभूति को कबीर अपने भाषा कौशल से ही रूपायित करते हैं। सांगरूपक का सुन्दर निर्वाह दृष्टिगत होता है | 

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे |  लै का अंग   | दोहा ३    |

गंग जमुन उर अंतरै, सहज सुंनि ल्यौं घाट ।

तहाँ कबीरै मठरच्या, मुनि जन जोवैं बाट ।। ३।। 

शब्दार्थ – 

गंग= गंगा, इड़ा, जमुन = यमुना, पिंगला, सहज सुंनि = सहस्त्रार, मठरच्या निवास किया । 

व्याख्या- 

गंगा-यमुना अर्थात् इड़ा-पिंगला के मध्य, सुषुम्ना के ऊपर (ब्रह्म रंध्र के ऊपर) शून्य शिखर है जिसे जीवात्मा के लय का सहजघाट भी कह सकते हैं। कबीर ने इसी घाट पर अपना निवास स्थान बना लिया है। वे भक्ति के द्वारा (योग, ज्ञान और प्रेम की समन्वित-साधना) इस लय की अवस्था तक पहुँच चुके हैं। 

मुनि लोग अन्य साधना पद्धतियों का सहारा लेने के कारण केवल प्रतीक्षा कर रहे हैं। वहाँ तक पहुँचने में असमर्थ हैं। कबीर ने शरीर के अन्दर ही गंगा-यमुना के प्रवाह को निरूपित किया है। बाह्य तीर्थों का निषेध करके कबीर ने धर्म साधकों को आन्तरिक तीर्थ तथा गंगा-यमुना (सरस्वती) में अवगाहन के लिए प्रेरित किया है । व्यतिरेक अलंकार की योजना है। योग का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है।

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