Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लाँबि का अंग

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लाँबि का अंग

     Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लाँबि का अंग  एक अद्वितीय साहित्यिक धारा को प्रस्तुत करते हैं, जिसमें वे आत्मा, ईश्वर, और समाज के साथ जुड़े महत्वपूर्ण तत्वों पर चिंतन करते हैं। “लाँबि का अंग” एक ऐसा दोहा है जो इसी सिद्धांत को छूने का प्रयास करता है। यह दोहा बताता है कि भगवान की प्राप्ति के लिए मार्ग लम्बा है, जिससे साधक को अपनी आत्मा को उन्नति की ओर ले जाने में सहायक हो सकता है।

Kabir Ke Dohe - कबीर के दोहे | लाँबि का अंग
Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लाँबि का अंग


    कबीर दास (Kabirdas), भक्ति काल के महान संत और कवि थे, जो 15वीं सदी में भारतीय साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत रहे थे। उनकी रचनाएँ भक्ति, तात्कालिक समाज, और मानवता के महत्वपूर्ण मुद्दों पर आधारित हैं।
    
इस दोहे का सार यह है कि भगवान की अद्भुतता को समझने और उससे मिलने के लिए व्यक्ति को अपने मार्ग को लम्बा बनाना होगा, जिसमें उन्हें आत्मा की उच्चता की दिशा में प्रगट होने वाली समस्याओं और परीक्षणों का सामना करना होगा। इससे ही व्यक्ति भगवान के साकार और निराकार स्वरूप को समझ सकता है और अपने जीवन को उच्चतम आदर्शों की दिशा में अग्रसर कर सकता है।

पूर्व परिचय – 
    लाँबि का शाब्दिक अभिप्राय है लम्बा अर्थात् ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग लम्बा है। कबीर उसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसी में समाहित हो गये, जैसे समुद्र में बूँद समा जाती है। ईश्वर ने भी कृपा करके उसे स्वात्म-भाव में मिला लिया । लाँबि का अर्थ अगाध तथा असीमित भी है। राम-रस अगाध है जिसके आस्वादन करने की इच्छा भक्त में निरन्तर बनी रहती है । 

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लाँबि का अंग  | दोहा १ |  

काया कमंडल भरि लिया, उज्जल निर्मल नीर । 

तन मन जोबन भरि पिया, प्यास न मिटी सरीर’ ।। १ ।।  

शब्दार्थ – 

काया = शरीर, नीर = पानी । 

व्याख्या – 

    कबीरदास  (Kabirdas)  कहते हैं कि मैंने शरीर रूपी कमंडल को प्रेम के उज्ज्वल और जल से भर लिया और तन-मन की पूरी शक्ति के साथ यौवन भर उसका पान किया, शरीर की प्यास नहीं बुझी, बल्कि पीने की इच्छा बढ़ती ही गई। (तिवारी – पीते ही तृष्णा जाती, कबीर में निरन्तर उसे पीने की इच्छा बनी रहती है) । व्यतिरेक और सांगरूपक के द्वारा भक्ति भाव के प्रति निरन्तर तीव्र होती हुई अनुभूति का चित्रण किया गया है । 

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लाँबि का अंग  | दोहा २  |  

मन उलट्या दरिया मिल्या, लागा मलि न्हाँन । 

थाहत ह न पावई, तू पूरा रहिमान ।। २ ।। 

शब्दार्थ – 

दरिया = सागर । 

व्याख्या – 

    कबीरदास   (Kabirdas) कहते हैं कि मन सांसारिकता से विमुख होकर ब्रह्मज्ञान रूपी समुद्र की ओर उन्मुख हो गया । उस सागर में मल-मल कर स्नानकरने लगा और पूर्णतया निष्कलुष हो गया । किन्तु उसकी गहराई की थाह लगाना आसान नहीं है । पूर्णब्रह्म की थाह एक ससीम व्यक्ति कैसे लगा सकता है ? ‘मन उलट्या’ का भाव उन्मनी अवस्था है। बाह्य वृत्ति से अन्तर्मुखी-वृत्ति की ओर उन्मुखता, जो साधक को अन्ततः जीवनमृत बना देती है ।

 

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लाँबि का अंग  | दोहा ३  |  

हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई। 

बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ || ३ || 

शब्दार्थ – 

हेरत = ढूँढ़ना, हिराई = लुप्त । 

व्याख्या – 

    कबीरदास   (Kabirdas) कहते हैं कि ईश्वर की खोज करते-करते हे सखी! कबीर गायब हो गया। बूँद समुद्र में समा गया अब उसे कैसे ढूँढ़ा जायेगा? साधना की चरमावस्था में जीवात्मा का अहंभाव नष्ट हो जाता है। अद्वैत की अनुभूति जाग जाने के कारण आत्मा का पृथक्ता बोध समाप्त हो जाता है। अंश आत्मा अंशी परमात्मा में लीन होकर अपना अस्तित्व मिटा देती है। यदि कोई आत्मा के पृथक्-अस्तित्व को खोजना चाहे तो उसके लिए यह असाध्य कार्य होगा। शुद्ध किन्तु नहीं १७० / कबीरग्रंथावली इस साखी में ‘बूँद’ आत्गा का और ‘समुंद’ परमात्मा का प्रतीक है। कबीर ने दृष्टांत के द्वारा तदाकार स्थिति का सुबोध अंकन किया है । 

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | लाँबि का अंग  | दोहा ४  |  

हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ । 

समुंद समाणा बूंद मैं, सो कत हेर्या जाइ || ४ || 

व्याख्या – 

    आत्मारूपी प्रेयसी कहती है कि हे सखी मैं प्रियतम को खोजते-खोजते स्वयं खो गयी। समुद्र बूँद में समाहित हो गया, उसे अब कैसे ढूँढ़ा जा सकता है? आत्मा जब तक परमात्मा से अपने को अलग समझ रही थी तभी तक उसकी खोज संभव थी । जब आत्मा के सीमित दायरे में असीमित परमात्मा की अनुभूति समाहित हो गयी तो परमात्मा का अलग अस्तित्व ही नहीं रह गया । अब तो शुद्ध चैतन्य आत्म स्वरूप ही हो गया । 
    वास्तव में आत्मा और परमात्मा अनुभव की दो स्थितियाँ हैं। दोनों अलग-अलग तत्व नहीं हैं। कबीर ने माना भी है कि जो ईश्वर सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। वही घट में आत्मरूप में स्थित है। अन्यत्र वे कहते हैं -मेरा मन सुमिरै राम कूँ, मेरा मन रामहिं आहि ।। इस साखी में जीव-भाव से ही आत्यन्तिक स्थिति में ब्रह्मत्व बोध का चित्रण है।

अनुग्रह की भी व्यंजना है। दृष्टांत का सौन्दर्य द्रष्टव्य है ।

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