Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे | हैरान का अंग

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे |  हैरान का अंग

    “कबीर की कविता Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे |  हैरान का अंग में डूबकी लगाते हुए, ‘हैरान का अंग’ विषय पर एक विशेष ध्यान देने वाले दोहों के साथ अपने आत्मा की खोज में निकलें। कबीर के शब्दों की गहरी धारा में डूबकी लगाएं और उनकी कविता के माध्यम से जीवन और चेतना के रहस्यों को खोलें। कबीर के दोहों के माध्यम से उनकी शिक्षाओं की सार्थकता का खोज करें, जो अस्तित्व की जटिलताओं पर एक अनूठे परिप्रेक्ष्य में प्रदर्शित होती हैं। कबीर की कविता के कवितायी दृष्टिकोण में लीन हों और उनके शब्दों की सामर्थ्यपूर्ण शक्ति का अनुभव करें।”

पूर्व परिचय – 

    कबीरदास पंडितों तथा खोखले संतों द्वारा राम या ब्रह्म के स्वरूप के विषय में किये गये भ्रामक कथनों से हैरान हैं । वे अपनी इसी व्यग्रता को इस अंग में व्यक करते हैं।

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे |  हैरान का अंग   | दोहा १ 

पंडित सेती कहि रहें, कह्या न मानै कोइ

ओ अगाध एका कहैं, भारी अचिरज होइ ।। १ ।।

शब्दार्थ – 

पंडित = ज्ञानियों तथाकथित पंडितों, ब्राह्मणों, अचिरज = आश्चर्य ।

व्याख्या – 

    कबीरदास कहते हैं कि जब मैं आत्मा और परमात्मा के अद्वैत वाद की बात करता हूँ, तो पंडित लोग मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करते। अतएव उसे स्वीकार भी नहीं करते। उलटे उन्हें मेरी बात पर आश्चर्य ही होता है। अगाध ब्रह्म के विषय में मेरा चिन्तन हठ वादिता तथा जातीय श्रेष्ठता-बोध के कारण उन्हें ग्राह्य नहीं हो पाता । शास्त्रीय-ज्ञान में उलझे पंडितों को अनुभूति ज्ञान प्रामाणिक नहीं लगता। ये अगाध ईश्वर को शास्त्रों की सीमा में बाँधकर द्वैत- बुद्धि रखते हुए अद्वैत की स्थापना करते हैं। यही आश्चर्य का विषय है । 

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे |  हैरान का अंग   | दोहा २  

बसे अपिंडी पिंड में, ता गति लषै न कोइ ।

कहै कबीरा संत हौ, बड़ा अचंभा मोहि ।। २ ।।

शब्दार्थ – 

अपिंडी = अशरीरी अश, पिंड = शरीर, अचंभा = आश्चर्य । –

व्याख्या – 

    कबीरदास जी कहते हैं कि वह अशरीरी -ईश्वर शरीर में निवास करता है। उसकी गति को कोई नहीं देख पाता। बिना उसकी गति को समझे ही लोग अपने को संत मान लेते हैं। यह बहुत बड़ा आश्चर्य है । कबीर का मंतव्य है कि वेद-शास्त्र के पीछे दौड़ने वाला पंडित, उस अदेह रूप ब्रह्म की घट-घट में व्याप्ति को समझ नहीं पाता । उसी तरह के अन्य अनेक साधक भी उस परमतत्त्व की आत्मरूप स्थिति का साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं, किन्तु अपने को सन्त मानने लगते हैं। वही असली संत है, जिसने घट में स्थित ब्रह्म के स्वरूप को अच्छी तरह से समझ लिया है ।

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